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Showing posts from May, 2020

देश को बचाना है ।

ना  जाने  ये  देश  किस  ओर  जा  रहा  है ।                      सही  को  छोड़  गलत  की  ओर  भाग  रहा  है । डॉक्टर, पुलिस  और  साधुओ  को  मारा  जा  रहा  है। ना  जाने  ये  देश  किस  ओर  जा  रहा  है । मॉब  लॉन्चिंग  की  आड़  में  यहां  बहुत  कुछ  हो  रहा  है । ना  जाने  हमारा  हिंदुस्तान  किस  ओर  चल  रहा  है । पूरी  दुनिया  भुखमरी  और  महामारी  से  लड़  रही  है । एक  हमारा  देश  है  जहाँ  अपना  अपने  से  ही  लड़  रहा  है । धर्म  और  रंग  के  नाम  पर  इंसान  को  इंसान  से  लड़ा  रहे  है । लाठी  डंडो  से  2  को  300  पीट  पीट  कर  मार  रहे  है । जो  पुलिस  सुरक्षा  के  लिए  है  वो  भी  डर  कर  भाग  रहे  है । ऐसे  में  हम  कैसे  कहे  कि  हम  एक  सभ्य  समाज  मे  रह  रहे  है । कहा  गए  वो  बहुमुखी  और  अवार्ड  वापसी  वाले । कहा  गए  वो  अपने  हिंदुस्तान  में  रहने  से  डरने  वाले । ना  जाने  क्यों,  सबका  चश्मा  सिर्फ  एक  तरफ  देखता  है । खुद  सब  बातें  एकता  की  करते  है  और,  फिर  हर  बार  सवाल  सिर्फ  एक  पर  ही  उठता  है । कभी  छोटी  सी  बात  पर  भी  सब  बोल  उठते  है । कभी  ब

पलायन (मजदूर)

#पलायन असली  तस्वीर  यही  है  हमारे  देश  की  और  इस  देश  की  नींव  भी  इन्ही  से  है । ये  पहचान  है  हमारे  भारत  की  और  हमारे  देश  की  पहचान  भी  इन्ही  से  है । मैं  लिख  तो  रहा  हू  पर  कुछ  कह  नही  सकता । आंखों  में  आंसू  भरने  के  अलावा  कुछ  कर  नही  सकता । वो  गरीब  है  जो  खुद्दारी  से  कमा  कर  खाते  थे , अब  कैसे  मान  ले  इतनी  मेहनत  के  बाद  भी,  अब  वो  जी  नही  सकता । ना  रहने  को  घर  बचा  है  नाही  खाने  को  खाना । ऐसे  में  पलायन  क्यों  ना  करे  एक  गरीब  बेचारा । सरकारें  दावा  कर  रही  है  हम  देते  है  सभी  को  खाने  को  रोटी , अगर  ऐसा  है  तो  क्यों,  सड़को  पर  फिर  रहा  मजदूरो  का  परिवार  मारा  मारा । एक  बीमारी  में  पूरे  देश  का  इतिहास  खुल  कर  सामने  आ  गया । किस  नेता  ने  कितना  काम  किया  लोगो  के  लिए ,   सब  निकल  के  आ  गया । हमने  गरीबी  खत्म  ना  कि  बस  गरीबी  को  छुपाते  रह  गए । एक  बीमारी  की  वजह  से  देश  का  असली  चेहरा  बाहर  आ  गया । कुछ  कहने  को  बचा  नही  है  अब  तो । कुछ  करने  को  रहा  नही  है  अब  तो । एक  घर

मातृ दिवस (mother's_ day)

एक  शब्द  ऐसा  है,  जिसका  कोई  अर्थ  नही । एक  शब्द  ऐसा  है,  जिसका  और  कोई  नाम  नही । एक  शब्द  ऐसा  है,  जिसके  ना  होने  से  जैसे  बिना  दिल  के  धड़कन  धड़कती  है । एक  शब्द  ऐसा  है,  जिसकी  कमी  ऐसी  है  जैसे  नाव  बिन  पानी  के  नदी  में  उतरती  है । ये  एक  शब्द  इतना  विशाल  और  अविश्वनीय  है  जिसे  मैं  कितना  भी  लिख  लू  खत्म  हो  नही  सकता । इस  एक  दिन  से  उस  शब्द  का  सम्मान  नही  होता । वो  एक  शब्द  'माँ ' है,  जिसे  पूरा  जीवन  भी  दे  दे  तो  भी  इंसान  कृतार्थ  नही  होता । माँ  जो  खुद  को  दुखो  में  तड़पाकर अपने  बच्चे  को  खुशियों  की  छावं  देती  है । माँ  जो  खुद  को  भूख  से  जलाकर  अपने  बच्चे  के  पेट  को  रोटी  की  आंच  देती  है । वो  माँ  ही  होती  है  जो  ना  जाने  कितनी  पीड़ाओं  को  सहकर  अपने  बच्चे  को  नव  महीने  कोख़  में  आराम  देती  है । माँ  का  प्यार  ही  है,  जो  कभी  बटता  नही । माँ  का  दुलार  ही  है,  जो  कभी  घटता  नही । बच्चा  कितना  भी  दुःख  को  छिपाए  पर  माँ  से  छिपता  नही । वही  बच्चा  बड़ा  हो  जा