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मैं ही नारी ! मैं ही दुर्गा !


तुम  नही  समझोगे  की  मैं  कौन  हूं?


मैं  जो  समाज  के  सारे  नियमो  को  निभाने  के  लिए  बाधित  हू।


मैं  जिसे  हर  बार  समाज  की  कुरीतियों  का  शिकार  बनना  पड़ता  है।


मैं  जो  कई  बार  बिना  गलतियों  के  भी  सज़ा  की  हकदार  बन  जाती  हूं।


मैं  जिसे  पैदा  करने  से  पहले  ही  कई  बार  मार  देते  है,
मैं  जो  हो  जाऊं  पैदा  तो  ये  मुझे  बोझ  समझते  है।


मैं  जो  जीना  चाहू  अपनी  मर्ज़ी  से  ये  जिंदगी  तो  ये  मुझे  गालिया  बकते  है।

मैं  जो  रहना  चाहू  आज़ाद  तो  ये  मेरे  पर  कुतरते  है।


इन  सब  के  बाद  भी  मैं  अक्सर  मुस्कुराती  हू!  कभी  ना  शिकायत  करती,  कभी  ना  घबराती  हू


क्योंकि  मैं  ही  तो  इस  समाज  का  सबसे  महत्वपूर्ण  किरदार  निभाती  हू


         मैं  माँ  हू!  मैं  ही  बेटी  भी,

       मैं  बहन  हू!  मैं  ही  पत्नी  भी,

      मैं  सरस्वती  हू!  मैं  ही  दुर्गा  भी,

      मैं  पार्वती  हू!  मैं  ही  काली  भी!

                   मैं  नारी  हू!

                मैं  हूं  सम्मान  भी!

पर  तुम  नही  समझोगे  की  मैं  कौन  हूं?






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